वामिक हुसैन रिजवी
दुनिया में जहां आजकल मंहगाई चरम सीमा पर हर कोई किसी न किसी परेशानी में लिप्त है लेकिन 72 फिरको में एक फिरका मुसलमानों में शिया बिरादरी का है जो हर साल इमामे हसन का दस्तरख़्वान बहुत धूम से मानता है!
इस ज़माने में देखा जाये तो दो वक़्त की रोटी जुटाना मुश्किल हो रहा है लेकिन वहीं 1400 साल से बादस्तूर जारी इमामे हसन के दस्तरखान को शिया कौम के लोग अपने जानते में कोई कमी नहीं छोड़ते हैं बहुत शौक से इमामे हसन के दस्तरख़्वान में लज़ीज़ पकवान बनाने की कोशिश करते है!
यह सिलसिला कब और कैसे शुरू हुआ इसके बारे में कभी आपने सोचा है आखिर क्यों होता है यह दस्तरख़्वान दरअसल यह दस्तरख़्वान पैग़म्बर मोहम्मद साहब के सबसे बड़े नवासे और जनाबे फातिमा ज़हरा के बड़े बेटे इमाम हसन के ज़रिये आज से 1455 साल पहले शुरू हुआ था खासकर गरीबों और मिस्कीनो की दावत के लिए कायम किया गया था ऐसा कहा जाता है जब इमाम हसन अलैहिस्सालम 5 साल के थे तो जनाबे फातिमा ज़हरा को ख़्वाब आया कि इमाम हसन गरीबों को अपने हाथो से घर के बने लज़ीज़ पकवान परोस रहे है इस बात का ज़िक्र उन्होने अपने बड़े बेटे इमाम हसन से किया तब से इस्लामिक माह की 22 जमादुसतनी को 5 वर्ष के इमामे हसन अलैहिस्सालम ने अपनी मां जनाबे फातिमा ज़हरा के हाथों बनाए गए पकवानों को गरीबों में बांटना और उन्हें खिलाना शुरू कर दिया हालांकि वह खुद हमेशा मक्के की रोटी और चटनी खाने खाते थे लेकिन गरीबों को लज़ीज़ खाने परोसते थे।
एक बार वह जब एक गरीब शख़्स को अपने हाथों से खाना परोस रहे थे तो उन्होंने देखा कि वह शख़्स एक निवाला खाता था और दूसरा निवाला रख देता था इस पर इमाम हसन ने फरमाया ऐ शक्स तो एक एक निवाला क्यों बचा रहा है इस पर उसने बताया कि हम यह निवाले अपने बच्चों के लिए बचा रहा हूँ जो भूखे है तो फिर इमाम ने उसे और उसके पूरे घर वालों को दावत पर बुलाया और इस बात का खासकर ध्यान रखा कि उनके मोहल्ले में कोई भूखा ना अब कोई सुए तब से हम सभी इमाम हसन का दस्तरख़्वान मनाते हैं तब से यह सिलसिला आज तक जारी है और तक़यामत तक जारी रहेगा ।